Sunday, February 15, 2026

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में विदेश मंत्री मार्को रूबियो का संबोधन

Department of State United States of America

अनुवादअमेरिकी विदेश विभाग केसौजन्य से



अमेरिकी विदेश मंत्रालय
वक्तव्य
विदेश मंत्री मार्को रूबियो
होटल बायरिशर होफ़
म्यूनिख, जर्मनी
फ़रवरी 14, 2026

विदेश मंत्री रूबियो:  आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आज हम यहां एक ऐतिहासिक गठबंधन के सदस्यों के रूप में एकत्रित हुए हैं, एक ऐसा गठबंधन जिसने दुनिया को बचाया और बदला। जब 1963 में इस सम्मेलन की शुरुआत हुई थी, तब यह एक ऐसे देश में – बल्कि यूं कहें, एक ऐसे महाद्वीप में – हो रहा था जो अपने आप में बंटा हुआ था। साम्यवाद और स्वतंत्रता के बीच की विभाजक रेखा जर्मनी के हृदय के ऊपर से गुजरती थी। बर्लिन की दीवार की पहली कांटेदार बाड़ सिर्फ़ दो साल पहले ही लगी थी।

और उस पहले सम्मेलन से कुछ ही महीने पहले, जब हमारे पूर्ववर्ती यहां म्यूनिख में पहली बार मिले थे, क्यूबाई मिसाइल संकट ने दुनिया को परमाणु तबाही के कगार पर ला खड़ा किया था। भले ही द्वितीय विश्वयुद्ध की यादें अमेरिकियों और यूरोपियों के मन में अभी भी ताज़ा थीं, हमने खुद को एक नई वैश्विक तबाही के मुहाने पर खड़ा पाया था — एक ऐसी तबाही जिसमें एक नए प्रकार के विनाश की क्षमता थी, जो मानव जाति के इतिहास में पहले की किसी भी चीज़ की तुलना में अधिक प्रलयंकारी और सर्वस्व विध्वंसकारी थी।

उस पहली बैठक के समय, सोवियत साम्यवाद अपने चरम पर था। हज़ारों वर्षों की पाश्चात्य सभ्यता दांव पर लगी थी। उस समय विजय बिल्कुल निश्चित नहीं थी। लेकिन हम एक साझा उद्देश्य से प्रेरित थे। हम केवल इस बात से एकजुट नहीं थे कि हम किसके ख़िलाफ़ लड़ रहे थे; हम इस बात से भी एकजुट थे कि हम किन सिद्धांतों के लिए लड़ रहे थे। और साथ मिलकर, यूरोप और अमेरिका की जीत हुई और एक महाद्वीप का पुनर्निर्माण हुआ। हमारे लोग समृद्ध हुए। समय के साथ, पूर्वी और पश्चिमी गुट फिर से एकजुट हो गए। एक सभ्यता एक बार फिर से अविभाजित बन गई।

वह बदनाम दीवार जिसने इस राष्ट्र को दो हिस्सों में बांट दिया था, ढह गई, और उसके साथ एक दुष्ट साम्राज्य का भी अंत हो गया, और पूर्व तथा पश्चिम फिर से एक हो गए। लेकिन इस जीत के उत्साह ने हमें एक खतरनाक भ्रम में डाल दिया: कि हम, जैसा कि कहा गया था, "इतिहास का अंत" देख रहे हैं; कि अब हर देश एक उदार लोकतंत्र होगा; कि केवल व्यापार और वाणिज्य द्वारा बनाए गए संबंध अब राष्ट्र-राज्य की अवधारणा की जगह लेंगे; कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था – अत्यधिक प्रयुक्त शब्द – अब राष्ट्रीय हितों का स्थान लेगी; और यह कि अब हम एक ऐसी दुनिया में रहेंगे जहां सीमाएं नहीं होंगी और हर व्यक्ति विश्व-नागरिक होगा।

यह एक मूर्खतापूर्ण विचार था जिसने मानवीय स्वभाव और मानव इतिहास के 5,000 से अधिक वर्षों के लिखित इतिहास से मिली सीखों की अनदेखी की। और इसकी हमें भारी क़ीमत चुकानी पड़ी है। इस भ्रम में, हमने मुक्त और निर्बाध व्यापार की एक कट्टर अवधारणा को अपनाया, जबकि कुछ राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा करते रहे और अपनी कंपनियों को व्यवस्थित रूप से हमारी तुलना में कम क़ीमत पर सामान बेचने के लिए सब्सिडी देते रहे – जिससे हमारे कारखाने बंद हो गए, हमारे समाज के बड़े हिस्से में औद्योगीकरण का अंत हो गया, कामगार और मध्यम वर्ग की लाखों नौकरियां विदेश चली गईं, और हमारी महत्वपूर्ण सप्लाई चेन का नियंत्रण हमारे विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों के हाथों में चला गया।

हम अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को अपनी संप्रभुता अधिकाधिक सौंपते गए, जबकि कई राष्ट्रों ने खुद की रक्षा करने की क्षमता बनाए रखने की क़ीमत पर विशाल कल्याणकारी राज्य खड़े किए। यह सब तब हुआ जब अन्य देशों ने मानव इतिहास के सबसे तेज़ सैन्य विस्तार में निवेश किया है और अपने हितों को साधने के लिए कठोर शक्ति के प्रयोग से कभी संकोच नहीं किया। जलवायु को लेकर पंथ वाली मानसिकता रखने वाले एक समूह को खुश करने के लिए, हमने ख़ुद पर ऐसी ऊर्जा नीतियां थोप लीं जो हमारे लोगों को गरीब बना रही हैं, जबकि हमारे प्रतिस्पर्धी तेल, कोयले और प्राकृतिक गैस तथा अन्य संसाधनों का दोहन करते रहे – न केवल अपनी अर्थव्यवस्थाओं को चलाने के लिए, बल्कि उन्हें हमारे ख़िलाफ़ दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए भी।

और सीमाहीन दुनिया की चाह में, हमने बड़े पैमाने पर प्रवासन की एक अभूतपूर्व लहर के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए, जो हमारे समाजों की एकजुटता, हमारी संस्कृति की निरंतरता और हमारे लोगों के भविष्य के लिए ख़तरा है। हमने ये गलतियां मिलकर कीं, और अब मिलकर ही हमें अपने लोगों के प्रति यह दायित्व निभाना है कि हम इन सच्चाइयों का सामना करें, आगे बढ़ें और पुनर्निर्माण करें।

राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका एक बार फिर नवीनीकरण और पुनर्स्थापना का कार्य संभालेगा, जो एक ऐसे भविष्य के दृष्टिकोण से प्रेरित होगा जो हमारी सभ्यता के अतीत की तरह ही गौरवशाली, संप्रभु और जीवंत हो। और यदि आवश्यक हुआ तो हम इस काम को अकेले करने के लिए तैयार हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता और हमारी आशा यही है कि हम इसे आपके साथ – यहां यूरोप में अपने मित्रों के साथ – मिलकर करें।

अमेरिका और यूरोप एक-दूसरे के पूरक हैं। अमेरिका की स्थापना 250 साल पहले हुई थी, लेकिन इसकी जड़ें बहुत पहले इसी महाद्वीप में पड़ी थीं। जिस व्यक्ति ने मेरे जन्म के देश को बसाया और निर्मित किया, हमारे तटों पर वह पुरानी दुनिया और नई दुनिया के बीच एक अटूट कड़ी के रूप में अपने पूर्वजों की स्मृतियों, परंपराओं और ईसाई धर्म को एक पवित्र विरासत के रूप में साथ लाया था।

हम एक ही सभ्यता – पश्चिमी सभ्यता – का हिस्सा हैं। हम उन सबसे गहरे बंधनों से एक-दूसरे से जुड़े हैं, जो राष्ट्र साझा कर सकते हैं – सदियों के साझा इतिहास, ईसाई आस्था, संस्कृति, विरासत, भाषा, वंश और उन बलिदानों से निर्मित बंधन, जो हमारे पुरखों ने उस साझा सभ्यता के लिए दिए, जिसके हम वारिस हैं।

और यही कारण है कि हम अमेरिकी कभी-कभी अपनी सलाह में थोड़े सख़्त और अधीर लग सकते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रंप यहां यूरोप में हमारे मित्रों से गंभीरता और पारस्परिकता की मांग करते हैं। मेरे मित्रों, इसका कारण यह है कि हम आपकी बहुत परवाह करते हैं। हम आपके और अपने भविष्य की गहरी चिंता करते हैं। और यदि कभी-कभी हम असहमत होते हैं, तो हमारी असहमति उस यूरोप के प्रति हमारी गहरी चिंता की भावना से उत्पन्न होती है जिससे जिससे हमारे संबंध केवल आर्थिक या सैन्य ही नहीं है। हम आध्यात्मिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से भी परस्पर जुड़े हुए हैं। हम चाहते हैं कि यूरोप मज़बूत बने। हमारा विश्वास है कि यूरोप का अस्तित्व बना रहना चाहिए, क्योंकि पिछली सदी के दो बड़े युद्ध हमें इतिहास की निरंतर याद दिलाते हैं कि अंततः हमारा भाग्य आपके भाग्य से जुड़ा हुआ है और जुड़ा रहेगा। क्योंकि हम जानते हैं – (तालियां) – कि यूरोप का भविष्य कभी भी हमारे लिए अप्रासंगिक नहीं हो सकता।

राष्ट्रीय सुरक्षा, जो इस सम्मेलन का मुख्य विषय है, केवल तकनीकी प्रश्नों की शृंखला नहीं है – हम रक्षा पर कितना व्यय करते हैं, कहां करते हैं, और उसे किस प्रकार तैनात करते हैं – ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। निःसंदेह हैं। परंतु ये बुनियादी सवाल नहीं हैं। बुनियादी सवाल, जिसका उत्तर हमें आरंभ में ही देना होगा, यह है कि हम वास्तव में किसकी रक्षा कर रहे हैं। क्योंकि सेनाएं अमूर्त धारणाओं के लिए नहीं लड़ती हैं। सेनाएं एक जनसमूह के लिए लड़ती हैं; सेनाएं राष्ट्र के लिए लड़ती हैं; सेनाएं जीवन-पद्धति के लिए लड़ती हैं। और हम इसी की रक्षा कर रहे हैं: एक महान सभ्यता जिसके पास अपने इतिहास पर गर्व करने, अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त होने का पूरा अधिकार है, और जो सदैव अपनी आर्थिक और राजनीतिक नियति की स्वामी बने रहने का संकल्प रखती है।

यह यूरोप ही था जहां स्वतंत्रता का बीज बोने वाले विचार पैदा हुए जिन्होंने दुनिया को बदल दिया। यह यूरोप ही था जिसने दुनिया को क़ानून का शासन, विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक क्रांति दी। यह वही महाद्वीप था जिसने मोज़ार्ट और बीथोवेन, दांते और शेक्सपियर, माइकल एंजेलो और दा विंची, बीटल्स और रोलिंग स्टोंल जैसी प्रतिभाओं को जन्म दिया। और यही वह स्थान है जहां सिस्टीन चैपल की मेहराबदार छतें और कोलोन के महान गिरजाघर की ऊंची मीनारें न केवल हमारे अतीत की महानता या ईश्वर में उस विश्वास की गवाही देते हैं जिसने इन अजूबों को प्रेरित किया, बल्कि वे उन चमत्कारों का पूर्वाभास भी देते हैं जो भविष्य के गर्भ में हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन जब हम अपनी धरोहर को लेकर किसी तरह का अपराधबोध नहीं रखेंगे और इस साझा विरासत पर गर्व करेंगे, केवल तभी हम मिलकर अपने आर्थिक और राजनीतिक भविष्य की कल्पना करने और उसे आकार देने का कार्य शुरू कर सकते हैं।

औद्योगीकरण का क्षय अपरिहार्य नहीं था। यह एक सोची-समझी नीतिगत पसंद थी – दशकों तक चलाया गया एक आर्थिक उपक्रम, जिसने हमारे राष्ट्रों को उनकी संपदा, उनकी उत्पादक क्षमता और उनकी स्वतंत्रता से वंचित कर दिया। और हमारी सप्लाई चेन की संप्रभुता का ह्रास किसी समृद्ध और स्वस्थ वैश्विक व्यापार प्रणाली का नतीजा नहीं था। यह मूर्खता थी। यह हमारी अर्थव्यवस्था का मूर्खतापूर्ण किंतु अपनी मर्ज़ी से किया गया रूपांतरण था, जिसने हमें अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर और संकट की स्थिति में अत्यंत असुरक्षित बना दिया।

बड़े पैमाने पर प्रवासन कोई हाशिये का, तुच्छ या नगण्य चिंता का विषय नहीं है, न था और न ही है। यह एक संकट था और बना हुआ है, जो पूरे पश्चिमी जगत में समाजों को रूपांतरित और अस्थिर कर रहा है। यह एक ऐसा संकट था और है, जो पूरे पश्चिमी जगत में समाजों को बदल रहा है और अस्थिर कर रहा है। हम सब मिलकर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को फिर से औद्योगीकृत कर सकते हैं और अपने लोगों की रक्षा करने की अपनी क्षमता को पुनर्निर्मित कर सकते हैं। लेकिन इस नए गठबंधन का काम सिर्फ़ सैन्य सहयोग और अतीत के हमारे उद्योगों को पुनर्स्थापित करने पर ही केंद्रित नहीं होना चाहिए। इसे साथ मिलकर हमारे साझा हितों को आगे बढ़ाने और नए क्षेत्रों में पैठ बनाने पर भी केंद्रित होना चाहिए – पश्चिमी जगत के दबदबे वाली एक नई सदी का निर्माण करने के लिए हमारी प्रतिभा, हमारी रचनात्मकता और हमारी जोशीली भावना को जकड़नों से आज़ाद करते हुए। हमें वाणिज्यिक अंतरिक्ष यात्रा और अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस; औद्योगिक ऑटोमेशन और लचीले विनिर्माण तंत्र पर ध्यान देना होगा; विशिष्ट खनिजों के लिए एक ऐसी सप्लाई चेन बना होगा जिस पर अन्य शक्तियों के शोषण का ख़तरा न हो; और ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं के बाज़ारों में हिस्सेदारी के लिए एकीकृत प्रतिस्पर्धात्मक प्रयास करने होंगे। साथ मिलकर हम न केवल अपने उद्योगों और सप्लाई चेनों पर दोबारा नियंत्रण पा सकते हैं बल्कि उन क्षेत्रों में भी समृद्धि हासिल कर सकते हैं जो 21वीं सदी को परिभाषित करेंगे।

किन हमें अपने राष्ट्रीय सीमाओं पर भी नियंत्रण प्राप्त करना होगा। यह तय करना कि कौन और कितने लोग हमारे देशों में प्रवेश करते हैं, यह विदेशियों के भय (ज़ेनोफ़ोबिया) को बढ़ावा देना नहीं है। यह नफ़रत नहीं है। यह राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा एक बुनियादी काम है। और ऐसा नहीं करना, न केवल अपने लोगों के प्रति हमारे सबसे बुनियादी कर्तव्यों से मुंह मोड़ना है, बल्कि यह हमारे समाजों के तानेबाने और हमारी सभ्यता के अस्तित्व के लिए एक गंभीर ख़तरा भी है।

और अंततः, हम तथाकथित वैश्विक व्यवस्था को अपने लोगों और अपने राष्ट्रों के अहम हितों से ऊपर नहीं रख सकते। हमें उस अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रणाली को त्यागने की आवश्यकता नहीं है, जिसे हमने बनाया था, और न ही हमें उस पुराने वैश्विक ढांचे की संस्थाओं को ध्वस्त करने की आवश्यकता है, जिन्हें हमने मिलकर बनाया था। लेकिन उनमें सुधार करना होगा। उन्हें पुनर्निर्मित करना होगा। उदाहरण के लिए, संयुक्तराष्ट्र में अभी भी दुनिया में भलाई का साधन बनने की अपार क्षमता है। लेकिन हम इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे गंभीर मुद्दों पर इसके पास कोई जवाब नहीं है और इसने लगभग कोई भूमिका नहीं निभाई है। यह गाज़ा में युद्ध का समाधान नहीं कर सका। इसके बजाय, यह अमेरिकी नेतृत्व ही था जिसने बर्बर लोगों से बंदियों को मुक्त कराया और एक नाज़ुक युद्धविराम संभव बनाया। संयुक्तराष्ट्र यूक्रेन में युद्ध का समाधान नहीं करा पाया। और, अभी भी पहुंच से दूर शांति की तलाश में दोनों पक्षों को बातचीत की मेज़ पर लाने के लिए अमेरिकी नेतृत्व और यहां उपस्थित कई देशों के साथ साझेदारी की ज़रूरत पड़ी।

इसी तरह यह तेहरान में कट्टरपंथी शिया मौलवियों के परमाणु कार्यक्रम को रोकने में असमर्थ था। इसके लिए अमेरिकी बी-2 बमवर्षकों से सटीकता के साथ 14 बम गिराने की ज़रूरत पड़ी। और यह वेनेज़ुएला में एक नार्को-आतंकवादी तानाशाह से हमारी सुरक्षा के लिए बने ख़तरे का समाधान नहीं कर पाया। इसके बजाय, उस भगोड़े को न्याय के कटघरे में लाने के लिए अमेरिकी विशेष बलों की आवश्यकता पड़ी।

एक आदर्श दुनिया में, इन सभी समस्याओं और अन्य अनेक संकटों का समाधान कूटनीतिक वार्ताओं और कड़े शब्दों वाले प्रस्तावों से हो जाता। किंतु हम एक आदर्श दुनिया में नहीं रहते, और हम उन लोगों – जो खुलेआम हमारे नागरिकों को धमकाते हैं और वैश्विक स्थिरता को संकट में डालते हैं – को अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अमूर्त अवधारणाओं को ढाल बनाते रहने की अनुमति नहीं दे सकते, जिनका वे स्वयं लगातार उल्लंघन करते रहते हैं।

यही वह मार्ग है जिस पर राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका ने कदम बढ़ाया है। यही वह मार्ग है, जिस पर हम यहां यूरोप में आपसे हमारे साथ चलने का आह्वान करते हैं। यह वही रास्ता है, जिस पर हम पहले भी साथ चले हैं – और आशा करते हैं कि फिर से साथ चलेंगे। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से पहले पांच शताब्दियों तक पश्चिमी जगत फैलता रहा था – उसके मिशनरी, उसके तीर्थयात्री, उसके सैनिक, उसके खोजकर्ता उसके तटों से निकलकर महासागरों को पार करते रहे; नए महाद्वीपों में बसते रहे; और दुनिया भर में विशाल साम्राज्य खड़े करते रहे।

लेकिन 1945 में, कोलंबस के युग के बाद पहली बार, यह विस्तार सिमटने लगा। यूरोप तबाह हो चुका था। उसका आधा भाग लौह आवरण के पीछे जीवन बिता रहा था और शेष भी मानो उसी दिशा में बढ़ता दिखाई देता था। महान पश्चिमी साम्राज्य अपने पतन के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुके थे। ईश्वरविहीन साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशविरोधी विद्रोहों ने इस प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया, जिसने आने वाले वर्षों में विश्व का स्वरूप बदल दिया और मानचित्र के विशाल हिस्सों को हंसुआ-हथौड़ा वाले लाल झंडों से ढंग दिया।

उस पृष्ठभूमि में – तब भी और आज भी – अनेक लोगों को यह लगने लगा था कि पश्चिम के दबदबे का दौर खत्म हो गया है और हमारा भविष्य हमारे अतीत की एक धुंधली और कमज़ोर सी गूंज बनकर रह जाएगा। लेकिन मिलकर, हमारे पुरखों ने यह पहचाना कि पतन एक विकल्प है, और उन्होंने उस विकल्प को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हमने यह कार्य पहले भी साथ मिलकर किया था, और यही वह कार्य है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका आज फिर से, आपके साथ मिलकर, करना चाहते हैं।

और यही कारण है कि हम अपने सहयोगियों को कमज़ोर नहीं देखना चाहते, क्योंकि इससे हम भी कमज़ोर बनते हैं। हम ऐसे सहयोगी चाहते हैं जो स्वयं अपनी रक्षा कर सकें, ताकि कोई भी विरोधी हमारी सामूहिक शक्ति को परखने का साहस न करे। इसीलिए हम नहीं चाहते कि हमारे सहयोगी अपराधबोध या लज्जा की बेड़ियों में जकड़े रहें। हम ऐसे सहयोगी चाहते हैं जिन्हें अपनी संस्कृति और अपनी विरासत पर गर्व हो; जो यह समझते हों कि हम सभी एक महान और उदात्त सभ्यता के वारिस हैं; और जो हमारे साथ मिलकर उसकी रक्षा करने को तैयार और सक्षम हों।

यही कारण है कि हम नहीं चाहते कि हमारे सहयोगी राष्ट्र जर्जर यथास्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाने के बजाय उसे सही ठहराने की कोशिश करें, क्योंकि हम अमेरिका में पश्चिम के इस प्रबंधित पतन का विनम्र और व्यवस्थित संरक्षक बने रहने में कोई रुचि नहीं रखते हैं। हम अलग होना नहीं चाहते, बल्कि एक पुरानी दोस्ती को पुनर्जीवित करना और मानव इतिहास की इस महानतम सभ्यता नवजीवन देना चाहते हैं। हम नए जोश से भरा गठबंधन चाहते हैं जो यह स्वीकार करे कि हमारे समाजों को जो बीमारी लगी है, वह केवल कुछ गलत नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि उसके पीछे निराशा और सुस्ती वाली अस्वस्थ मानसिकता है।  हम जो गठबंधन चाहते हैं, वह ऐसा हो जो डर – जलवायु परिवर्तन का डर, युद्ध का डर, टेक्नोलॉजी का डर – कारण निष्क्रियता का शिकार न हो। इसके बजाय, हम एक ऐसा गठबंधन चाहते हैं जो भविष्य की ओर हिम्मत के साथ तेज़ कदम बढ़ाए। और हमें बस एक ही डर है, वह है अपने बच्चों के लिए अपने देश को ज़्यादा गौरवान्वित, मज़बूत और खुशहाल नहीं बनाने की शर्म का डर।

हम ऐसा गठबंधन चाहते हैं जो अपने लोगों की रक्षा करने, अपने हितों की सुरक्षा करने और उस स्वतंत्र क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए तत्पर हो जो हमें अपनी नियति स्वयं गढ़ने की क्षमता देती है – न कि ऐसा गठबंधन जो एक वैश्विक कल्याणकारी व्यवस्था चलाने और पिछली पीढ़ियों के कथित पापों का प्रायश्चित करने के लिए अस्तित्व में हो। हमारा गठबंधन ऐसा हो जो अपनी ताक़त को बाहरी व्यवस्थाओं के हवाले न करे, न उसे सीमित या अधीनस्थ होने दे; जो अपने राष्ट्रीय जीवन की आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भर न रहे; और जो यह शिष्टाचारपूर्ण दिखावा न बनाए रखे कि हमारी जीवन-पद्धति अनेक विकल्पों में से एक विकल्प भर है, और जो कार्रवाई करने से पहले अनुमति मांगे। और सबसे बढ़कर, ऐसा गठबंधन जो इस तथ्य की स्वीकृति पर आधारित हो कि हम – पश्चिमी जगत – ने जो साझा विरासत पाई है, वह अद्वितीय, विशिष्ट और अपूरणीय है, क्योंकि अंततः ट्रांसअटलांटिक साझेदारी की नींव है।

मिलकर इस तरह से काम करते हुए, हम न केवल एक विवेकपूर्ण विदेश नीति को पुनर्स्थापित करेंगे; बल्कि इससे अपने बारे में हमारी समझ भी अधिक स्पष्ट हो सकेगी। इससे हम विश्व में अपना उचित स्थान फिर से हासिल करेंगे, और ऐसा करते हुए सभ्यता को मिटाने वाली शक्तियों को कड़ा संदेश देंगे और उन्हें रोकेंगे, जो आज अमेरिका और यूरोप दोनों के लिए ख़तरा पैदा कर रही हैं।

तो ऐसे समय में जब ट्रांसअटलांटिक युग के अवसान की सुर्खियां बन रही हैं, यह सभी को साफ़ तौर पर पता होना चाहिए कि यह न तो हमारा लक्ष्य है और न ही हमारी इच्छा – क्योंकि हम अमेरिकियों के लिए, हमारा घर भले ही पश्चिमी गोलार्ध में हो, लेकिन हम हमेशा यूरोप की संतान ही रहेंगे। (तालियां।)

हमारी कहानी एक इतालवी अंवेषक के साथ शुरू हुई, जिसके एक नई दुनिया की खोज के लिए अज्ञात की ओर साहसिक कदम उठाने से अमेरिका में ईसाई धर्म आया – और वह एक ऐसी किंवदंती बन गया जिसने हमारे अग्रणी राष्ट्र की कल्पना को परिभाषित किया।

हमारी पहली उपनिवेश बस्तियां अंग्रेज आबादकारों ने बसाई गई थीं, जिनके हम न केवल अपनी भाषा के लिए ऋणी हैं, बल्कि अपनी पूरी राजनीतिक और क़ानूनी प्रणाली के लिए भी। हमारी सीमाओं को स्कॉट्स-आइरिश लोगों ने आकार दिया – अल्स्टर की पहाड़ियों के उस गर्वित जोशीले क़बीले ने, जिसने हमें डेवी क्रॉकेट, मार्क ट्वेन, टेडी रूज़वेल्ट और नील आर्मस्ट्रांग जैसे व्यक्तित्व दिए।

हमारे महान मध्य-पश्चिमी क्षेत्र को जर्मन किसानों और कारीगरों ने बनाया, जिन्होंने खाली मैदानों को वैश्विक कृषि महाशक्ति में बदल दिया – और हां, अमेरिकी बीयर की गुणवत्ता में सुधार किया। (ठहाका।)

अंदरूनी इलाक़ों में हमारा विस्तार रोएंदार खाल के फ़्रांसीसी व्यापारियों और खोजकर्ताओं के पदचिन्हों पर हुआ, जिनके नाम आज भी पूरे मिसिसिपी घाटी की सड़कों और कस्बों के साइनबोर्डों की शोभा बढ़ाते हैं। हमारे घोड़े, हमारे रैंच, हमारे रोडियो – काउबॉय की वह रोमांचक छवि जो अमेरिकन वेस्ट का पर्याय बन गई – इन सबकी उत्पत्ति स्पेन में हुई थी। और हमारे सबसे बड़े और सबसे प्रतिष्ठित शहर का नाम न्यूयॉर्क रखे जाने से पहले 'न्यू एम्स्टर्डम' था।

क्या आप जानते हैं कि जिस वर्ष मेरे देश की स्थापना हुई, उस समय लॉरेन्ज़ो और कैटालिना जेरोल्डी पीडमोंट-सार्डिनिया साम्राज्य के कसाले मोनफ़ेरातो में रहते थे? और होसे एवं मैनुएला रेना स्पेन के सेबिया में निवास करते थे। मुझे नहीं पता कि वे उन 13 कॉलोनियों के बारे में क्या जानते थे, या कुछ जानते भी थे या नहीं, लेकिन मैं इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हूं: उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि 250 साल बाद, उनका एक प्रत्यक्ष वंशज आज इस महाद्वीप पर उस नन्हे राष्ट्र के मुख्य राजनयिक के रूप में मौजूद होगा। और देखिए मैं आपके सामने खड़ा हूं, अपनी ही कहानी से यह याद दिलाते हुए कि हमारा इतिहास और हमारी नियति हमेशा परस्पर जुड़े रहेंगे।

दो विनाशकारी विश्व युद्धों के बाद, हमने मिलकर एक बिखरे हुए महाद्वीप का पुनर्निर्माण किया। जब हम एक बार फिर लौह आवरण द्वारा विभाजित हुए, तब स्वतंत्र पश्चिमी देशों ने पूर्व में अत्याचार के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे साहसी असंतुष्टों के साथ हाथ मिलाया ताकि सोवियत साम्यवाद को हराया जा सके। हम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़े, फिर सुलह की, फिर लड़े और फिर से सुलह की। और कापयोंग से लेकर कंधार तक के युद्धक्षेत्रों में हम कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और अपना बलिदान दिया।

आज मैं यहां यह स्पष्ट करने आया हूं कि अमेरिका समृद्धि की एक नई सदी का मार्ग प्रशस्त कर रहा है, और एक बार फिर हम इसे आपके साथ – हमारे प्यारे सहयोगी देशों और हमारे सबसे पुराने दोस्तों के साथ – मिलकर करना चाहते हैं। (तालियां।)

हम इसे आपके साथ मिलकर करना चाहते हैं, एक ऐसे यूरोप के साथ जिसे अपनी विरासत और अपने इतिहास पर गर्व है; एक ऐसे यूरोप के साथ जिसमें स्वतंत्रता के सृजन की भावना है, जिसने अनजान समुद्रों में जहाज़ भेजे और हमारी सभ्यता को जन्म दिया; एक ऐसे यूरोप के साथ जिसके पास अपनी रक्षा करने के साधन और ज़िंदा रहने का संकल्प है। हमें पिछली सदी में साथ मिलकर हासिल की गई उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए, लेकिन अब हमें एक नई सदी के अवसरों का सामना करना और उन्हें आत्मसात करना होगा – क्योंकि बीता हुआ कल ख़त्म हो चुका है, भविष्य अनिवार्य है, और हमारा साझा भाग्य हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। धन्यवाद। (तालियां)

सवाल: विदेश मंत्री जी, मुझे नहीं पता कि आपने इस सभागार में वह राहत की सांस सुनी या नहीं, जो हम अभी आपके भाषण को सुनते समय महसूस कर रहे थे – जिसे मैं आश्वासन और साझेदारी के संदेश के रूप में देखता हूं। आपने अमेरिका और यूरोप के परस्पर जुड़े रिश्तों की बात की, जो मुझे दशकों पहले आपके पूर्ववर्तियों के उन वक्तव्यों की याद दिलाता है, जब चर्चा यह हुआ करती थी: क्या वास्तव में अमेरिका एक यूरोपीय शक्ति है? क्या अमेरिका यूरोप में एक शक्ति है? हमारी साझेदारी के बारे में आश्वस्त करने वाला संदेश देने के लिए धन्यवाद।

असल में यह पहली बार नहीं है कि मार्को रुबियो म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में शामिल हुए हैं – वे यहां पहले भी कुछ बार आ चुके हैं, लेकिन यह पहला मौक़ा है जब वह यहां विदेश मंत्री के तौर पर वक़्ता बने हैं। तो फिर से धन्यवाद। हमारे पास अब कुछ सवालों के लिए कुछेक मिनट हैं, और अगर इजाज़त हो, तो हम श्रोताओं से लिए गए सवालों पर चर्चा करें।

कल और आज यहां एक अहम मुद्दा, बेशक, एक अहम सवाल बना हुआ है कि यूक्रेन में युद्ध से कैसे निपटा जाए। बीते दिन भर में, पिछले 24 घंटों के दौरान हुई बातचीत में हममें से कई लोगों ने यह राय दी है कि रूसी – मैं इसे बोलचाल की भाषा में कहूं तो – रूसी केवल समय काटने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी वास्तव में किसी सार्थक समझौते में कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वे अपने अधिकतमवादी लक्ष्यों में से किसी पर भी समझौता करने के लिए तैयार हैं। यदि संभव हो, तो हमें अपना आकलन बताइए कि हम इस समय कहां खड़े हैं और हमारे लिए आगे की राह क्या है।

विदेश मंत्री रूबियो: देखिए, मैं समझता हूं इस समय हमें जिन मुद्दों का सामना कर रहे हैं – उनसे जुड़ी एक अच्छी ख़बर है। अच्छी ख़बर ये है कि इस युद्ध को समाप्त करने के लिए जिन मुद्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है, उनका दायरा अब सीमित हो गया है। यह अच्छी बात है। बुरी ख़बर यह है कि वे मुद्दे अब सिमट कर सबसे कठिन सवालों पर आ गए हैं, और उस दिशा में अभी काम किया जाना बाकी है। आपके सवाल को मैं समझता हूं – उसका जवाब यह है कि हमें नहीं पता। हमें नहीं पता कि रूसी युद्ध ख़त्म करने को लेकर गंभीर हैं कि नहीं; उनका कहना है कि वे हैं – लेकिन किन शर्तों के तहत वे ऐसा करने के लिए तैयार हैं और क्या हम ऐसी शर्तें खोज सकते हैं जो यूक्रेन को स्वीकार्य हों और जिन पर रूस भी हमेशा सहमत रहे। लेकिन हम इसकी जांच पड़ताल जारी रखेंगे।

इस बीच, बाकी सब कुछ जारी है। अमेरिका ने रूस के तेल पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए हैं। भारत के साथ हमारी वार्ताओं में हमें उनका यह आश्वासन मिला है कि वे अतिरिक्त रूसी तेल की खरीद बंद करेंगे। यूरोप ने भी आगे बढ़ते हुए अपने क़दम उठाए हैं। 'पर्ल प्रोग्राम' जारी है जिसके तहत यूक्रेनी युद्ध प्रयासों के लिए अमेरिकी हथियार बेचे जा रहे हैं। इसलिए ये सभी चीज़ें निरंतर चल रही हैं। अंतरिम अवधि में कुछ भी रुका नहीं है। इसलिए उस संबंध में यहां समय काटने जैसी कोई बात नहीं है।

जिस प्रश्न का हम अभी उत्तर नहीं दे सकते – लेकिन जिसकी हम लगातार पड़ताल करते रहेंगे – वह यह है कि क्या कोई ऐसा नतीजा संभव है जो यूक्रेन को स्वीकार्य हो और जिसे रूस भी मान ले। मैं कहूंगा कि अब तक यह लक्ष्य पकड़ में नहीं आया है। हां, हमने इस मायने में प्रगति अवश्य की है कि कई वर्षों में पहली बार, कम-से-कम तकनीकी स्तर पर, दोनों पक्षों के सैन्य अधिकारियों की पिछले सप्ताह बैठक हुई थी। और मंगलवार को फिर से बैठकें होंगी, भले ही प्रतिभागी वही न हों।

देखिए, हम इस युद्ध को समाप्त करने की दिशा में अपनी भूमिका निभाने के लिए हरसंभव प्रयास करते रहेंगे। मुझे नहीं लगता कि इस कमरे में कोई भी इस युद्ध के बातचीत के ज़रिए समाधान के ख़िलाफ़ होगा, बशर्ते उसकी शर्तें न्यायपूर्ण और टिकाऊ हों। यही हमारा लक्ष्य है, और हम इसे पाने का प्रयास जारी रखेंगे – साथ ही प्रतिबंधों और अन्य उपायों के मोर्चे पर हमारी कार्रवाइयां भी जारी रहेंगी।

सवाल: बहुत-बहुत धन्यवाद। यक़ीनन अगर हमारे पास और समय होता, तो यूक्रेन पर और भी कई सवाल होते। लेकिन मैं एक बिल्कुल अलग विषय पर सवाल पूछकर अपनी बात ख़त्म करना चाहूंग। बस कुछ ही मिनटों में यहां अगले वक्ता चीन के विदेश मंत्री होंगे। विदेश मंत्री जी, जब आप सीनेट में थे, तो लोग आपको चीन के प्रति सख़्त रुख रखने वाला – चाइना हॉक – मानते थे।

विदेश मंत्री रूबियो: ऐसा मानते थे।

सवाल: ऐसा मानते थे?

विदेश मंत्री रूबियो: हां।

सवाल: हम जानते हैं कि लगभग दो महीने में, राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच शिखर बैठक होने वाली है। हमें उस बैठक से अपनी अपेक्षा के बारे में बताएं। क्या आप आशावादी हैं? क्या चीन के साथ कोई 'डील' हो सकता है? आप क्या उम्मीद करते हैं?

विदेश मंत्री रूबियो: इस बारे में मैं ये कहना चाहूंगा। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, और धरती की दो प्रमुख शक्तियों के तौर पर, ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उनके साथ संवाद करें और बात करें, और आप में से कई लोग द्विपक्षीय आधार पर भी ऐसा ही करते हैं। चीन के साथ बातचीत न करना भूराजनीतिक दृष्टि से गलत व्यवहार होगा। मैं यह भी कहूंगा कि हम व्यापक वैश्विक हितों वाले दो बड़े देश हैं, इसलिए हमारे राष्ट्रीय हित अक्सर एक-दूसरे से मेल नहीं खाएंगे। उनके राष्ट्रीय हित और हमारे राष्ट्रीय हित कई बार अलग होंगे। और, दुनिया के प्रति हमारा दायित्व है कि हम इन्हें यथासंभव बेहतर तरीके से प्रबंधित करने का प्रयास करें, और ज़ाहिर है हम आर्थिक या उससे भी बुरे टकराव से बचें। और इसीलिए इस संबंध में उनके साथ संवाद जारी रखना हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

जिन क्षेत्रों में हमारे हित एक-दूसरे से मेल खाते हैं, वहां मेरा मानना है कि हम मिलकर विश्व पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं, और हम उनके साथ ऐसा करने के अवसरों की तलाश करते हैं। लेकिन हमें चीन के साथ संबंध रखने होंगे। और आज यहां मौजूद किसी भी देश को चीन के साथ संबंध रखने ही होंगे, हमेशा यह समझते हुए कि हम जिस भी बात पर सहमत हों, वह हमारे राष्ट्रीय हित की क़ीमत पर नहीं होनी चाहिए। और स्पष्ट रूप से, हम चीन से अपने राष्ट्रीय हित में कार्य करने की अपेक्षा करते हैं, जैसा कि हम प्रत्येक राष्ट्र-राज्य से अपने राष्ट्रीय हित में कार्य करने की अपेक्षा करते हैं। और, कूटनीति का उद्देश्य यही है कि जब हमारे राष्ट्रीय हित एक-दूसरे से टकराते हों, तो उन स्थितियों को कुशलता से संभाला जाए, हमेशा शांतिपूर्ण ढंग से ऐसा करने की उम्मीद के साथ।

मुझे लगता है कि हमारी एक ख़ास ज़िम्मेदारी भी है क्योंकि व्यापार को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जो कुछ भी होता है, उसका वैश्विक असर होता है। इसलिए हमारे सामने दीर्घकालिक चुनौतियां हैं जिनका सामना हमें करना होगा, और वे चीन के साथ हमारे संबंधों में तनाव का कारण बन सकती हैं। यह केवल अमेरिका के लिए ही सत्य नहीं है; यह व्यापक पश्चिमी जगत पर भी उतना ही लागू होता है। फिर भी, मेरा मानना है कि जहां तक संभव हो, हमें इन मतभेदों का प्रबंधन इस प्रकार करना चाहिए कि अनावश्यक टकराव से बचा जा सके। लेकिन किसी को भी किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। हमारे देशों के बीच – और व्यापक पश्चिमी जगत और चीन के बीच – कुछ बुनियादी चुनौतियां हैं, जो विभिन्न कारणों से निकट भविष्य में बनी रहेंगी। और ये कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन पर हम आपके साथ मिलकर काम करने की उम्मीद करते हैं।

सवाल: बहुत-बहुत धन्यवाद, विदेश मंत्री जी। हमारा समय समाप्त हो गया है। मुझे अफ़सोस है कि मैं उन सभी लोगों के सवाल नहीं ले सका, जो सवाल पूछना चाहते थे। माननीय विदेश मंत्री महोदय, आश्वस्त करने वाले आज के संदेश के लिए आपका धन्यवाद। मेरा मानना है कि इस सभागार में इसकी अत्यंत सराहना की गई है। आइए, एक बार फिर हम तालियों से आपका स्वागत करें। (तालियां।)


मूल स्रोत: https://www.state.gov/releases/office-of-the-spokesperson/2026/02/secretary-of-state-marco-rubio-at-the-munich-security-conference/

अस्वीकरण: यह अनुवाद शिष्टाचार के रूप में प्रदान किया गया है और केवल मूल अंग्रेज़ी स्रोत को ही आधिकारिक माना जाना चाहिए।


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